भूतिया मंच

 बरसात की रात थी। घर के सभी लोग सुबह तक सो चुके थे, लेकिन अरुणिमा को नींद नहीं आ रही थी। वह अपने बिस्तर पर पलट रही थी, लेकिन आँखों में सोने का कोई इरादा नहीं था। उसके मन में कुछ विचारों का घेरा था।

अरुणिमा के परिवार का घर बड़ा ही पुराना था। इसे एक बार उनके दादाजी ने बनवाया था। घर की दीवारों पर कई किस्से लिखे थे, जो अरुणिमा को रोज सुनाए जाते थे। उसके दादाजी कहते थे कि इस घर में कभी भूत नहीं आ सकते, क्योंकि यहां प्यार और माँसूकर्म है और भूत इन दोनों से डरते हैं।

लेकिन अरुणिमा को भूतों के बारे में ना तो विश्वास था और न ही अविश्वास। वह तो इन चीजों को सिर्फ कहानियों में ही मानती थी। लेकिन उस रात कुछ अजीब घटनाएं होने लगी।

घर के सभी लाइटें बंद की गई थीं, और सिर्फ एक मोमबत्ती की रोशनी थी, जो कमरे को धीरे-धीरे रोशन कर रही थी। अरुणिमा धीरे-धीरे नींद में खो रही थी कि उसके कानों में अचानक कोई गर्जना सुनाई दी। उसने सोचा कि शायद बाहर बिजली गिरी होगी और वह उसकी आवाज होगी। पर फिर से वह गर्जना सुनाई दी।

अरुणिमा के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। वह बिस्तर से उठकर देखने लगी। उसके रूम के सामने एक पुरानी कुर्सी रखी थी, जो भूतों की कहानियों में दिखाई देती है। अरुणिमा ने अपने आप को समझाया कि यह सब उसके विचारों की वजह से हो रहा है।

लेकिन फिर से वह गर्जना सुनाई दी। इस बार वह और तेज़ थी। अरुणिमा ने अपने आप को नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन वह गर्जना और बढ़ गई। उसके दिल के धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि वह अब तक़ कमरे के बाहर खड़ी हो गई थी।

तभी उसने देखा कि वह पुरानी कुर्सी स्वयं ही हिल रही है! अरुणिमा के रोम रोम में डर घुस गया। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह अपनी आँखों को सही देख रही है। वह कुर्सी को देख रही थी, जैसे कि कोई अदृश्य शक्ति उसे उठा रही हो।

उसके दिमाग में ख़याल आया कि शायद उसके दादाजी सही थे। शायद भूत होते हैं और शायद वे इसी कुर्सी पर बैठते हैं रात्रि में। वह देखने लगी कि उस रात उस कुर्सी पर बैठे किसी भूत की आभा हो रही है।

अरुणिमा के दिमाग में तमाम कई प्रश्न उभरने लगे। क्या वाक़ई भूत होते हैं? क्या वह भूत को देख रही है? या फिर उसका ये सब अवसर था किसी विचार-विमर्श का, कुछ और समझने का।

जब उसने देखा कि कुर्सी धीरे-धीरे उठकर हिल रही है, उसने बिना सोचे वहां से भागने का फैसला किया। वह अपने कमरे से निकली और भागने लगी।

उसके दिल में अभी भी डर था, लेकिन वह जानती थी कि उस घर में कुछ अजीब हो रहा था। उसे लगता था कि उसे वहां से निकलना ही सही होगा।

सुबह होने के साथ-साथ उस घर के दरवाजे खुल गए। उसके परिवारवाले उसे बाहर आते हुए देखकर हैरान रह गए। वे अरुणिमा से पूछने लगे कि क्या हुआ था, लेकिन उसे वह खुद भी नहीं पता था।

उस दिन के बाद अरुणिमा उस घर में कभी वापस नहीं गई। उसके दादाजी की बातें उसे वाकई अजीब लगने लगीं। कहानियों के अलावा उसे कोई भूत का साक्षात्कार नहीं हुआ था, लेकिन वह उस रात हुई घटना को लेकर विचार करती रही।

जीवन भर उसके मन में एक प्रश्न रह गया - क्या भूत होते हैं या वह रात की घटना सिर्फ एक विचार की वजह से हुई थी। शायद वह जवाब कभी नहीं पा सकेगी, लेकिन उसके दिल में उस रात की घटना का यह रहेगा एक ख़ास स्थान


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